जुबां लिखती रही
सौ सौ सवालों का
बस एक जवाब
बात होती रही
बात खींचती रही
नाम के नाम पर
काम से काम पर
कुछ हम कहते रहे
उनकी 'चुप' सहते रहे
एक चमकती हुई
बिजली कड़की थी जो
संग मेरे, शयन में
रोज बिछती रही
सौ सौ सवालों का
बस एक जवाब
बात होती रही
बात खींचती रही
नेह, नूपुर पहन कर
छनकता रहा
रातरानी का जादू
महकता रहा
दो घड़ी साथ सट कर
अगर बैठ लें
तन मचलता रहा
मन उचकता रहा
प्रणय रस की
सुराही सी रिसती रही
सौ सौ सवालों का
बस एक जवाब
बात होती रही
बात खींचती रही
रोम झंकृत हुए
त्वचा तनने लगी
बात ऐसी मुड़ी
सांस चलने लगी
छोड़ कर मध्य में
अभी छुप जाएगी
और कहेगी सखी
हाय! जलने लगी
कामिनी काम पीड़ित
झिझकती रही
सौ सौ सवालों का
बस एक जवाब
बात होती रही
बात खींचती रही
प्रियतमा है निधि
रूप रस गंध की
कामनाएं सभी
देह संबंध की
कागजों पर उतरकर
पिघलने लगीं
प्रेम स्वीकृत हुआ
आंख मिचती रही
सौ सौ सवालों का
बस एक जवाब
बात होती रही
बात खींचती रही
दो दो अमृत कलश
न छुप सके स्वांग से
रस बहकने लगा
ओंठ, भगनांग से
देह प्रस्तुत हुई
सीप सी खुल गई
प्राण स्रावित हुआ
त्व सिसकती रही
सौ सौ सवालों का
बस एक जवाब
बात होती रही
बात खींचती रही