Friday, 28 June 2013

प्रकृति जब जागेगी

बलिदान कहो या आहूति
दान कहो या त्याग
...... करना होगा |

अतृप्त क्षुधा के मौन का
है अंतराल इतना लम्बा
...... भरना होगा |

सूख चुके हैं वक्षोरूह
अब मत नोचो !
होगा कुरूप कितना भविष्य
कुछ तो सोचो !
समय रहे न चेते तो
यह तय समझो,
प्रस्ताव नहीं कुछ भी होगा
निर्णय समझो

जब कभी मौन ये टूटेगा
निश्चेष्ट चेतना जागेगी
मांगेगी तो हे! मानव
प्रकृति लहू ही मांगेगी ||

11.10.98

Friday, 7 June 2013

धूप ने खिड़की बदल ली है !

धूप ने खिड़की बदल ली है !
अब वो उस पुरानी खिड़की से नहीं आती
इधर से आती है,
और इतने से ही बदल जाती हैं
अँधेरे और रौशनी की जगहें
बदल जाते हैं दीवारों के रंग
और बदल जाता है कमरा मेरा ॥

धूप ने खिड़की बदल ली है !
अब चमकती दीवार इधर की है
और उस पुरानी दीवार पर
अँधेरा ही रहता है ।
नाखून से खुरच कर बनाए
वो आड़े टेढ़े निशान
अब साफ़ नज़र नहीं आते ।
अभी तो समझ भी ना पाया था
क्यूँ खींचे थे और तब तक,
धूप ने खिड़की बदल ली है ॥

धूप ने खिड़की बदल ली है !
और बहुत से
नए साये नज़र आने लगे हैं,
निरंकुश साये !
पुराने साये कमरे का हिस्सा से थे
इसलिए कभी साये लगे ही नहीं
और ये नए अजनबी साए
किसी अनचाहे मेहमान की तरह
कब्जा किये बैठे हैं ।
अब जाने कब सूर्य उत्तरायण हों ॥

धूप ने खिड़की बदल ली है !
और किसी ढीठ की तरह
सबसे पीछे के कोने पे जा बैठी है
मेरे साँझ से कोने पे !
वो कोना जो मेरे अंतर के अन्धकार को
समेट लेता था खुद में
मुझे छुपा लेता
और कोई देख नहीं सकता था
नमकीन पानी के सूखे निशानों को
बेवक्त की अजानों को !
मगर अब धूप ने खिड़की बदल ली है ॥

रिश्ते यूँ ही अचानक नहीं बदलते
परिभाषाएं बदलती हैं
और किसी दिन अचानक
बेधड़क वो घुस आती है
नितांत मेरे कमरे में
अपना हिस्सा मांगने
तमाचा मार कर उठाती है
बताती है कि हिस्सेदार और भी हैं
और तब पता चलता है
धूप ने खिड़की बदल ली है
अब वो उस पुरानी खिड़की से नहीं आएगी,
कभी नहीं आयेगी ॥

Wednesday, 5 June 2013

ख्वाब पड़े है इधर उधर, और हैं हथेलियाँ दो ही ...

ख्वाब पड़े है इधर उधर, और हैं हथेलियाँ दो ही
कभी कुछ छूट जाता है, कभी कुछ छूट जाता है

हक़ीक़तों की ज़मी है सख्त बहुत पत्थर पत्थर
कभी कुछ टूट जाता है,कभी कुछ टूट जाता है

हरेक उम्मीद को कुछ कह के मैं समझा ही देता हूँ
कहीं कोई झूठ जाता है, कहीं कोई झूठ जाता है

तुम्हारे नाम को मैंने, दफनाया था बहुत गहरे
कभी कोई ढूंढ जाता है, कभी कोई ढूंढ जाता है

मना तो लूं मगर कब तक, वही नौ दस तरीके हैं
कभी कोई रूठ जाता है, कभी कोई रूठ जाता है

मेरे काँधे पे मेरे दोस्त कितनी बार जीतेंगे
मेरी आँखों के आगे आँख, कभी कोई मूँद जाता है
................................कभी कोई मूँद जाता है