Monday, 6 May 2013

दिल भी मेरा पत्थर का ही होगा

मैं बहुत सख्त हूँ-बहुत सख्त! ...बताया था यही मैंने
वो यही जानता है दिल भी मेरा पत्थर का ही होगा ॥

बिछड़ कर मुझसे वो टूटा भी और कमज़ोर भी हुआ
कलाई पर निशां गहरा किसी नश्तर का ही होगा ॥

फूँक कर पाँव रखते हो, सोच कर बात कहते हो
तुम्हारे इस हुनर में हाथ एक ठोकर का भी होगा ॥

अभी भटके हो सहरा में, अभी कुछ दिन यही होगा
हरएक निशां पे बोलोगे किसी लश्कर का ही होगा ॥

वो रोया खून के आंसू और जिसका दिल नहीं पिघला
क्यूँ ना कह दूं वो भगवान् भी पत्थर का ही होगा ॥

(05.05.2013)

Saturday, 4 May 2013

मैं कैसे मान लूं कि है वही चाहत पहले वाली

घड़ी भर भी नहीं बोले, रहे घंटों तक संग मेरे
मैं कैसे मान लूं कि है वही चाहत पहले वाली ||

वो पहले तो मेरी बातों पे जैसे झूम जाते थे
मेरी आहट पे उनके रस्ते भी तो घूम जाते थे
वही अब हैं मेरी आवाज़ भी ना पहचान पाते हैं
रही ना शायद अब उनको कोई आदत पहले वाली ||

मेरी बातें मेरे सपने यही थे रात दिन कुछ दिन
के जैसे सांस भी लेना गवारा था ना मेरे बिन
और ये क्या है कि संग बैठे है फिर भी साथ नहीं हैं
मैं कैसे मान लूं कि है वही साथी पहले वाली ||

नहीं मिलती नज़र से यूँ नज़र के चैन आ जाये
नहीं मिलते हैं अब ऐसे सुबह से रैन आ जाये
मगर अब मिलते हैं ऐसे के जैसे रस्म हो कोई
नहीं मिलती मुझे मिलके वही राहत पहले वाली ||

घड़ी भर भी नहीं बोले, रहे घंटों तक संग मेरे
मैं कैसे मान लूं कि है वही चाहत पहले वाली ||

Friday, 3 May 2013

वर्ष 1989 की गर्मियों की छुट्टी में अपने गाँव, जिला जौनपुर में प्रवास के दौरान कुछ ऐसे परिवारों के बारे में सुना जिनके बच्चों ने दूध के विषय में केवल सुना ही होता था | दूध का स्वाद वो नहीं जानते थे | कुपोषण और कई बार भोजन का आभाव और उस इलाज़ की सामर्थ्य न होने के कारण बच्चों की मृत्यु तक हो जाती थी | ऐसी ही एक घटना के बाद ये रचना हुई:

माँ जन्नत कैसी होती होगी
क्या उसमें रोटी भी होगी ?
ऐसे सवाल पर माँ हंस दी
एक टूटती आह कस दी |
हाँ बेटा, ऐसी ही होगी
भूख वहां नहीं लगती होगी
दूध चावल मिलता होगा
बच्चों का चेहरा खिलता होगा |
माँ दूध कैसा होता है
गुड़ से मीठा होता है ?

माँ की नज़रें फिर से फिर गयीं
दो बूँदें अश्कों की गिर गयीं |
क्या वहां पे खाना बांटता होगा
पेट वहां नित भरता होगा
है सुना वहां ना कोई गम है
वहां गरीबी भी कम है |
जब वहां पे सब सुख पाते हैं
हम क्यों नहीं वहां पे जाते है !
वो नगर नहीं इतना सस्ता
मुझे पता नहीं उसका रास्ता ||

माँ ! वहां तो मर के जाते हैं
फिर हम क्यों नहीं मर जाते हैं
मौत यहाँ कहाँ बटती है
उसकी भी कीमत लगती है |
माँ जन्नत क्या असमान में है ?
अपने तो बस अरमान में है
चल तू एक रोटी खा ले
फिर मैं तुझे सुलाऊँगी
तू सोना परियां आयेंगी
तुझको जन्नत ले जाएँगी ||

पर ये क्या वो तो हो गया पार 
अब कहाँ उसे इसकी दरकार 
मौत के पर ले हुआ परिंदा 
जन्नत का हो गया बाशिंदा ||
(13-07-1989)

Friday, 26 April 2013

तुम मिलोगी मुझे

तुम कदम बा कदम तेज़ होते गए
मैं हरएक सांस पे जैसे थमता गया
दोनों के दरमियाँ भीड़ भरती रही
दोनों के बीच कोहरा सा जमता गया ||

एकटक मेरी नज़रें तुम्हें तकती रहीं
पर मुड़ी तुम नहीं एकपल के लिए
धुंध होती रही आँख की रौशनी
बुझने से लगे राह के सब दिए ||

मैं अकेला सनम बस ख्यालों में गुम
सोचता ही रहा जाग कर रात भर
तुम मिलोगी मुझे तुम मिलोगी मुझे
तुम मिलोगी मुझे या जाएगी ये उमर ||

(23.04.1994)

Monday, 22 April 2013

फफक के रो पड़ी वो थी

1993 में बलात्कार जैसे जघन्य अपराध कम ही सुनने को मिलते थे, 20 वर्ष की आयु थी, मन बहुत कच्चा था, सही मायनों में पीड़ित की पीड़ा समझ पाने जितनी अकल आयी नहीं थी लेकिन इतना ज्ञान जरूर था कि उस पिता पर क्या बीती होगी, जिसकी आत्मा बस्ती है उस बच्ची में, जिसकी जरा सी पीड़ा से रात भर उसे नींद नहीं आती, इतने बड़े कष्ट पर उसको कितनी पीड़ा हुई होगी | 

शिल्प संबंधी बहुत सी त्रुटियाँ इस रचना में होंगी, फिर भी ये मेरे दिल के बहुत करीब है ...

अश्रु पूर्ण चक्षु थे, विराट गम ह्रदय में था
नहीं किसी ह्रदय में थी, पड़ी कहीं कहर में थी
मिली थी जब मुझे ख़ुशी, फफक के रो पड़ी वो थी |

झुकी झुकी वो जा रही, जाने क्यूँ सिमट गयी
देख मुझे दौड़ के, आ के यूँ लिपट गयी
जैसे मुझसे दूर हो, जहाँ में खो गयी वो थी
मिली थी जब मुझे ख़ुशी, फफक के रो पड़ी वो थी |

नोच के खचोट के, किया था उसका हाल ये
नग्न अंग शील भंग, था कलंक भाल पे
नेत्र उसके बंद थे, गिर के सो पड़ी वो थी
मिली थी जब मुझे ख़ुशी, फफक के रो पड़ी वो थी |

आह एक निकल गयी, देख उसके हाल को
रूह तक विकल भई, पढ़ के उस सवाल को
नीर नयन में लिए, पूछ जो रही वो थी
मिली थी जब मुझे ख़ुशी, फफक के रो पड़ी वो थी |

शांति की कांति अब, थी नहीं ललाट पे
गौर वर्ण पर उतर आये साए रात के
इस जहां की भीड़ में खबर बनी खड़ी वो थी
मिली थी जब मुझे ख़ुशी, फफक के रो पड़ी वो थी |

अस्थियाँ ही शेष थीं, वो मात्र अवशेष थी
या मेरी परी लिए कोई छद्म वेश थी
ठोकरों में थी पड़ी, कभी मेरी मड़ी जो थी
मिली थी जब मुझे ख़ुशी, फफक के रो पड़ी वो थी |

बाहुपाश में पड़ी, सिसक सिसक वो रो रही
अपलक निहारती, नींद में वो खो रही
इस जहाँ में बस जीवित और दो घड़ी वो थी
मिली थी जब मुझे ख़ुशी, फफक के रो पड़ी वो थी |

चेतना रहित नयन, शून्य में निहारते
अधर अगर हिले भी तो, बस मुझे पुकारते
असहाय सा खड़ा था मैं, दर्द से भरी वो थी
मिली थी जब मुझे ख़ुशी, फफक के रो पड़ी वो थी |

लिपटी ही जा रही कि छूट नहीं जाऊं मैं
और फिर मना रही कि रूठ नहीं जाऊं मैं
मोतियों की साँस की टूटती लड़ी वो थी
मिली थी जब मुझे ख़ुशी, फफक के रो पड़ी वो थी |

हर एक पल में दूर वो, और दूर जा रही
आत्मा भी रो पड़े, इस तरह बुला रही
तड़प रही थी आत्मा कि अंग संग जुडी वो थी
मिली थी जब मुझे ख़ुशी, फफक के रो पड़ी वो थी ||

Tuesday, 16 April 2013

चिरप्रतीक्षित खिलौना

रोज़ शाम घर पहुँचते ही
वो दौड़ कर आ जाती
और गोद चढ़ जाती थी
कुछ लाये मेरे लिए ?
एक सवाल हर रोज़

मैं थका भी होता था
और खाली हाथ भी
बहका देता
और फिर
हमारा खेल शुरू हो जाता
और खेल खेल में ही
वो भूल जाती थी खिलौना
और मैं भूल जाता था
दिन भर की थकन

एक रोज़
एक खिलौना था मेरे पास
उसके सवाल का जवाब
उसका प्यारा खिलौना
चिरप्रतीक्षित खिलौना

और अब वो
सिर्फ खिलौने से खेलती है
दिन भर खेलती है

रोज़ शाम को घर पहुचते ही
मेरा खिलौना अपने खिलौने के साथ
दौड़ कर आता है और...
अब उसी के साथ खेलता है |

सोचता हूँ
ये दूसरी दुनिया मैंने ही तो दी है
और थकन अब याद रहती है
हर रोज़ |

Saturday, 6 April 2013

प्रेम मेरा मझधार

प्रेम शब्द की
इस समाज में
जो भी स्थापित
परिभाषा है
तुम उसके उस पार खड़ी... प्रिये
मैं पड़ा इस पार

मैं पड़ा इस पार
चिल्ला कर पूछ रहा हूँ
क्या मुझसे है प्यार
क्या मुझसे है प्यार
कम से कम इतना कहती
सुनता है संसार... प्रिये
मैं खड़ी इस पार

मैं खड़ी इस पार सखे
सब लाग लपेट करेंगे
बातों से ही अपनी
हर घर के पेट भरेंगे
निर्मोही संसार... प्रेमवर
मैं खड़ी इस पार

ऋतुराज के काज
मन मेरा पल पल पर पीर धरे
तीर तुम्हारा पार
BP 604
कंपन शरीर करे है
राधिके ... प्रेम मेरा मझधार
तुम खड़ी उस पार ।। 

Friday, 5 April 2013

जीवन में... धूप बनी रहती है

तुम आ जाते हो... तो जीवन में
एक जीवन उग जाता है
पेड़ हरे हो जाते हैं
आकाश बदल जाता है

कुछ तो है तुममें जो सबका
रंग रूप बदल देता है
संसार बदल देता है
ये भूप बदल देता है

है तुम्हे पता ?
तुममें ज्योति स्वरूपनी रहती है
तुम रहते हो तो जीवन में
धूप बनी रहती है ||

तुम आ जाते हो .... तो मन से
मंद पवन सी उठती है
मन चन्दन हो जाता है
तन चन्दन हो जाता है

एक तुम्हारे होने से
अवसाद चला जाता है
मन को थका देने वाला
हर राग छला जाता है
हँसते गाते मेरे दिन का
एक भाग भला जाता है

जब रहते हो
हर एक भाव में सीध बनी रहती है
दूर कहीं होते हो तो भी
उम्मीद बनी रहती है

तुम रहते हो तो जीवन में
धूप बनी रहती है ||

Tuesday, 12 March 2013

रात / नवीन कुमार पाठक

एक तरफ खींचता हूँ
दूसरी तरफ उलझ जाती है
उलटता हूँ पलटता हूँ
ढील देता हूँ
फिर खींचता हूँ
डरता हूँ गाँठ न पड़ जाए
नाखून भी अभी ही काटे हैं
गड़ा के खोल भी ना पाऊँगा

कमबख्त! दिखता भी नहीं है
कहीं सिरा तो होगा ही
वही दिख जाता ।

फिर सोचता हूँ एक गाँठ तो आनी ही है
यहीं से तोड़ कर सिरा बना दूं
और जोड़ दूं सुबह से ।

उलझी हुई डोर की मानिन्द
रात हुई है ।

Thursday, 27 December 2012

इक बूढ़े दरिया के दिल में, चलो जवानी रखते हैं.../ नवीन कुमार पाठक

इक बूढ़े दरिया के दिल में, चलो जवानी रखते हैं
सदियों से ठहरे पानी पे, कुछ बूँदें पानी रखते हैं

कहने सुनने से दूर बहुत, कोई ठिकाना करते हैं
अब तक के बीते लम्हों का नाम कहानी रखते हैं

बरसों की दूरी रिश्तों में सन्नाटा भर देती हैं
सन्नाटे की पीठ पे कुछ बर्फीला पानी रखते हैं

वो आएगा औ हम सबको अपनी यादें दे जायेगा
वो भी तो ले के जाये, कुछ तूफानी करते हैं

ये तारीख जगह और वक़्त एक दिन यादें हो जायेंगे
इन मुस्कानों के बक्सों में थोड़ी शैतानी रखते हैं

इक बूढ़े दरिया के दिल में, चलो जवानी रखते हैं !!