Thursday, 27 December 2012

इक बूढ़े दरिया के दिल में, चलो जवानी रखते हैं.../ नवीन कुमार पाठक

इक बूढ़े दरिया के दिल में, चलो जवानी रखते हैं
सदियों से ठहरे पानी पे, कुछ बूँदें पानी रखते हैं

कहने सुनने से दूर बहुत, कोई ठिकाना करते हैं
अब तक के बीते लम्हों का नाम कहानी रखते हैं

बरसों की दूरी रिश्तों में सन्नाटा भर देती हैं
सन्नाटे की पीठ पे कुछ बर्फीला पानी रखते हैं

वो आएगा औ हम सबको अपनी यादें दे जायेगा
वो भी तो ले के जाये, कुछ तूफानी करते हैं

ये तारीख जगह और वक़्त एक दिन यादें हो जायेंगे
इन मुस्कानों के बक्सों में थोड़ी शैतानी रखते हैं

इक बूढ़े दरिया के दिल में, चलो जवानी रखते हैं !!

Monday, 12 November 2012

ज़ख्म पे ज़ख्म लगा हो तो... / नवीन कुमार पाठक

घाव गर गहरा बहुत हो तो समय लेता है
ज़ख्म पे ज़ख्म लगा हो तो समय लेता है

वक़्त के साथ वक्ती साथ बदल जाते हैं
खून से खून जुदा हो तो समय लेता है

मेरे होने का भरम मुझको घुने जाता है
बदलना हो यही एहसास तो समय लेता है

ये मेरे नाम के आगे जो लिखा है, क्या है
हरतरफ धुंध हो तो दिखने में समय लेता है

आज कुछ तुमसे सुना है तो कभी मुस्का दूंगा
जो सुकूं कम हो तो एहसास, समय लेता है

ज़ख्म पे ज़ख्म लगा हो...

Tuesday, 30 October 2012

फिर क्यूँ तुम्हे बेगाने लगे !!

आज तक तो पीठ करके ना आये थे ना गए थे तुम
बेबस सही पर हम ही थे,  फिर क्यूँ तुम्हे बेगाने लगे ||

तय कर लिया तो कर लिया, फिर सोचना कैसा
किसलिए उंगली फंसा ली, हम मुड़ के जब जाने लगे||

अपनी भी कश्ती कब तलक भटकेगी झोंके खाएगी
कारवां से छूटे हुए भी, सब, आखिर तो ठिकाने लगे||

कैसे चंद मिनटों में जले और मिट के मिटटी हो गए
ना थे कागज़ी रिश्ते मेरे, गढ़े थे और बड़े ज़माने लगे||

Wednesday, 10 October 2012

ज़िन्दगी तू कितनी बड़ी हो गयी !!

कहाँ से चली थी और आ के कहाँ पे... खड़ी हो गयी
इत्ती सी थी जब मिली थी मुझे, ज़िन्दगी तू कितनी बड़ी हो गयी !!

Friday, 18 May 2012

क्षणिकायें

धुएं को देखोगे तो धुंधला ही दिखेगा,
चाँद अगर दिखेगा तो उजला ही दिखेगा |
इश्क को जमीं मिलने तक रुक लो,
तेज आंधियों में आँखें मूँद लो झुक लो |
जब तक हो नहीं जाता, इश्क सच मुच में,
होता रहेगा बार बार और पहला ही लगेगा |

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वो मुझ जैसा है, मेरे काम का है
मापना कैसा ?
वो एक अच्छा इंसान है
उसे मेरा दोस्त होना चाहिए |

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Thursday, 17 May 2012

लो ये मैंने, हाथ दोनों, सामने तेरे पसारे

लो ये मैंने, हाथ दोनों, सामने तेरे पसारे
मैंने माना मेरी हद से, दूर हैं तेरे सितारे
दम मेरा, औकात मेरी, तेरी चुटकी के इशारे
लो ये मैंने, हाथ दोनों, सामने तेरे पसारे ||

तेरे चलाने का तरीका, मुझको समझ आया नहीं
है बात ये दीगर कभी खुद से भी चल पाया नहीं
मसअला कुछ तालियाँ ही रह गयीं जलसे के बाद
कौन ये समझा भला, हैं रक्स ये तेरे ही सारे ||

मेरी ख्वाहिश पे तेरी साजिश, जिंदगी हरदम लगी
मेरे हिस्से जितनी भी थी, मुझको हमेशा कम लगी
लेखनी तेरी मेरे संग बीच ही बहती रही
मेरा मुक़द्दर इस पार और मर्जी मेरी थी उस किनारे ||

दम मेरा, औकात मेरी, तेरी चुटकी के इशारे
लो ये मैंने, हाथ दोनों, सामने तेरे पसारे ||

Saturday, 28 April 2012

लोग हर बात का मतलब निकाल लेते हैं

बात सीधी को सीधी नहीं रहने देते
लोग हर बात का मतलब निकाल लेते हैं;
बहुत मासूम सी बातें हैं और ये दिल भी
जाने क्या करते हैं, उलझन में डाल देते हैं ||

लफ्ज़ को लफ्ज़, खयाल को शह देना था
वाह भी करते हैं तो उसमें सवाल देते हैं;
सामने रख के प्याले की कसम देते हैं
ये मेरे दोस्त मुझे मुश्किल में डाल देते हैं ||

राह चलते रहे ऐसा ना कभी सोचा था
ठोकरे क्यूँ मेरी राहों में डाल देते हैं
साल में एक दफा ये खुल के बरसने वाले
बारहा क्यों मेरे जी को मलाल देते हैं ||

होगी ये रस्म कोई तो चलो ऐसा ही सही
जाने वालों पे कुछ सिक्के उछाल देते हैं
वो गया है जो, थोड़ा यहीं रह जाता है
ऐसा करते हैं कल जड़ से निकाल देते हैं ||

लोग हर बात का मतलब निकाल लेते हैं !!

Thursday, 26 April 2012

कल एक तारा नहीं उगा!

मैं और मेरा आसमान
और कुछ टिमटिमाते तारे;
यही है मेरी शाम की महफ़िल |

एक बार, रोज ही पूछ लेते हैं
दिन कैसा गया
मौसम में कुछ नया
इधर उधर का नया ताज़ा
और फिर, कल मिलने का वादा |

शहर की जगमगाती जिंदगी
इक तो 
रात को स्याह रात होने नहीं देती;
दूसरे धूल की चादर
देर रात तक भी नहीं जाती
और बहुत दूऽऽर तक ढक देती है
मेरे आसमानी रिश्तों को |

आज पच्छिम की तरफ
धुंध कुछ ज्यादा थी
एक साथी मेरा नहीं दिखा;
मेरे शरीर का पच्छिमी हिस्सा
तब ही से कुछ सुन्न सा है;
और ये खालीपन
कल साँझ तक तो रहेगा ही |

अब किसी से कहूँ भी तो क्या
कोई क्या समझेगा 

कि कल एक तारा नहीं उगा!!

Wednesday, 25 April 2012

अधूरापन नहीं भरता

किसी करवट बदन मेरा, नहीं पूरा नहीं पड़ता
मैं इस लेटूं कि उस लेटूं , अधूरापन नहीं भरता
कुछ तो है, जो है, या है नहीं, कुछ रोज जैसा कुछ
थकन से चूर हूँ फिर क्यूँ , नींद से गिर नहीं पड़ता ||

मेरे बिस्तर की सिलवट गिन के देखीं, रोज जितनी हैं
यही दो चार चीज़ें नींद को, जरूरत और कितनी हैं
एक ही नींद में मेरी सुबह हो जाती थी अब तक
नींद की धार मर गयी है, समय काटे नहीं कटता ||


चिढ़न तो होती ही है जब मेरे मन का नहीं होता
बिगड़ जाऊं अगर एकबार, बिना निपटे नहीं सोता
मगर लड़ने झगडने के भी तो कुछ कायद होते हैं
जरा गुस्सैल हूँ तो भी, नींद से तो नहीं लड़ता ||

जो आदत पड़ गयी सो पड़ गयी, बदली नहीं जाती
बदल जाये जगह भी तो, नींद अक्सर नहीं आती
मेरी तकिया बदल दी है कि चादर मखमली कर दी
मुझे सूती की आदत है, ये सूती सा नहीं गड़ता ||

Saturday, 21 April 2012

निकलती है ज़िंदगी

धुएं की तरह हाथ से फिसलती है ज़िंदगी
हथेली पे रक्खी बर्फ सी पिघलती है ज़िंदगी
सारे जतन सारे मनन खाली ही जायेंगे
हर क़दम से आगे एक क़दम, चलती है ज़िंदगी ||

मंज़िल के फासलों को समय की लगाम है
अपने नियत समय पे ही हो जानी शाम है
अब साँसों से तेज अपनी चाल कर सके तो ठीक
मुट्ठी में बंद रेत सी  निकलती  है ज़िंदगी ||

है कौन भला शख्श जो रस्ता दिखायेगा
हर सर पे है तलवार, सर खुद को बचायेगा
अपनी लड़ाई खुद ही अगर लड़ सके तो ठीक
झुलसी अगर तो मोम सी गलती है ज़िंदगी ||

या रब मेरे कदमों में थोड़ी और जान दे
मेरे गुनाह माफ़ कर हाथों को थाम ले
तेरी खुदाई मुझपे करम कर सके तो ठीक
साँसों के साथ जिस्म में जलती है ज़िंदगी ||
(22.02.02)