Saturday, 28 April 2012

लोग हर बात का मतलब निकाल लेते हैं

बात सीधी को सीधी नहीं रहने देते
लोग हर बात का मतलब निकाल लेते हैं;
बहुत मासूम सी बातें हैं और ये दिल भी
जाने क्या करते हैं, उलझन में डाल देते हैं ||

लफ्ज़ को लफ्ज़, खयाल को शह देना था
वाह भी करते हैं तो उसमें सवाल देते हैं;
सामने रख के प्याले की कसम देते हैं
ये मेरे दोस्त मुझे मुश्किल में डाल देते हैं ||

राह चलते रहे ऐसा ना कभी सोचा था
ठोकरे क्यूँ मेरी राहों में डाल देते हैं
साल में एक दफा ये खुल के बरसने वाले
बारहा क्यों मेरे जी को मलाल देते हैं ||

होगी ये रस्म कोई तो चलो ऐसा ही सही
जाने वालों पे कुछ सिक्के उछाल देते हैं
वो गया है जो, थोड़ा यहीं रह जाता है
ऐसा करते हैं कल जड़ से निकाल देते हैं ||

लोग हर बात का मतलब निकाल लेते हैं !!

Thursday, 26 April 2012

कल एक तारा नहीं उगा!

मैं और मेरा आसमान
और कुछ टिमटिमाते तारे;
यही है मेरी शाम की महफ़िल |

एक बार, रोज ही पूछ लेते हैं
दिन कैसा गया
मौसम में कुछ नया
इधर उधर का नया ताज़ा
और फिर, कल मिलने का वादा |

शहर की जगमगाती जिंदगी
इक तो 
रात को स्याह रात होने नहीं देती;
दूसरे धूल की चादर
देर रात तक भी नहीं जाती
और बहुत दूऽऽर तक ढक देती है
मेरे आसमानी रिश्तों को |

आज पच्छिम की तरफ
धुंध कुछ ज्यादा थी
एक साथी मेरा नहीं दिखा;
मेरे शरीर का पच्छिमी हिस्सा
तब ही से कुछ सुन्न सा है;
और ये खालीपन
कल साँझ तक तो रहेगा ही |

अब किसी से कहूँ भी तो क्या
कोई क्या समझेगा 

कि कल एक तारा नहीं उगा!!

Wednesday, 25 April 2012

अधूरापन नहीं भरता

किसी करवट बदन मेरा, नहीं पूरा नहीं पड़ता
मैं इस लेटूं कि उस लेटूं , अधूरापन नहीं भरता
कुछ तो है, जो है, या है नहीं, कुछ रोज जैसा कुछ
थकन से चूर हूँ फिर क्यूँ , नींद से गिर नहीं पड़ता ||

मेरे बिस्तर की सिलवट गिन के देखीं, रोज जितनी हैं
यही दो चार चीज़ें नींद को, जरूरत और कितनी हैं
एक ही नींद में मेरी सुबह हो जाती थी अब तक
नींद की धार मर गयी है, समय काटे नहीं कटता ||


चिढ़न तो होती ही है जब मेरे मन का नहीं होता
बिगड़ जाऊं अगर एकबार, बिना निपटे नहीं सोता
मगर लड़ने झगडने के भी तो कुछ कायद होते हैं
जरा गुस्सैल हूँ तो भी, नींद से तो नहीं लड़ता ||

जो आदत पड़ गयी सो पड़ गयी, बदली नहीं जाती
बदल जाये जगह भी तो, नींद अक्सर नहीं आती
मेरी तकिया बदल दी है कि चादर मखमली कर दी
मुझे सूती की आदत है, ये सूती सा नहीं गड़ता ||

Saturday, 21 April 2012

निकलती है ज़िंदगी

धुएं की तरह हाथ से फिसलती है ज़िंदगी
हथेली पे रक्खी बर्फ सी पिघलती है ज़िंदगी
सारे जतन सारे मनन खाली ही जायेंगे
हर क़दम से आगे एक क़दम, चलती है ज़िंदगी ||

मंज़िल के फासलों को समय की लगाम है
अपने नियत समय पे ही हो जानी शाम है
अब साँसों से तेज अपनी चाल कर सके तो ठीक
मुट्ठी में बंद रेत सी  निकलती  है ज़िंदगी ||

है कौन भला शख्श जो रस्ता दिखायेगा
हर सर पे है तलवार, सर खुद को बचायेगा
अपनी लड़ाई खुद ही अगर लड़ सके तो ठीक
झुलसी अगर तो मोम सी गलती है ज़िंदगी ||

या रब मेरे कदमों में थोड़ी और जान दे
मेरे गुनाह माफ़ कर हाथों को थाम ले
तेरी खुदाई मुझपे करम कर सके तो ठीक
साँसों के साथ जिस्म में जलती है ज़िंदगी ||
(22.02.02)

Tuesday, 17 April 2012

मन को ना चंचल होने दो

ना नेह करो इतना कि मन को दुखी करे
हाँ स्नेह करो इतना कि दिल में खुशी भरे
इस तरह से जीवन को जीने कि विधि करो
मन ना तो हो बंधन में ना स्वच्छंद रहे ||

मोह ले मन को एक पल में इतना हो प्यारा
इतना हो गंभीर कि नभ का एक सितारा
जीने को मजबूर करे जिसका आकर्षण
मिट जाने को काफी हो जिसका एक इशारा ||

जब देखो तो, दो नयन लिए मन कि छाया
वाणी से भी ना छुपी रहे मन कि माया
स्पर्श तुम्हारा इतना ज्यादा कोमल हो
यूं लगे कि जैसे छू ली हो मन की काया ||

मन को ना चंचल होने दो, ये बेकल कर देगा
ज्यादा भावुक जो हुआ कहीं, तो विव्हल कर देगा
जा मिले कहीं जो किसी के मन से चुपके से
तुमको ही नहीं, सारे जग को ये पागल कर देगा ||

मन को ना चंचल होने दो...
(20.01.98)

Sunday, 15 April 2012

... जिंदगी

कीड़े मकोडों सी जिंदगी
या कि
मृग मरीचिका में फंसे हुए
कुछ सूंघते-टटोलते
कीड़े मकोडो से मानव |

जीवन में कोई लक्ष्य ही
धारण ना कर सके
या यूँ कहें
सोचने विचारने का
अवसर ही नहीं मिला |

संतो ने कहा
जीवन जल के सामान है
उसे बहने दो
स्वयं ही मार्ग बना लेगा
और मूर्ख मानव ने मान लिया |

छोड़ दिया जीवन को निरुधेश्य
और सूंघता-टटोलता फिर रहा है
कीड़ों मकोडो कि तरह |
(03.08.01) 

हे प्रणेता ! ऐसा वर दो

हे प्रणेता ! ऐसा वर दो
दृढ निश्चयी मेरे मन को कर दो

दुष्कर्मो और कुविचार से
संघर्ष सदा ही विजित करूं
आस्थाओं के ही अनुरूप
अन्तर्रात्मा जीवित करूं
 
हे संहारक ! ऐसा कर दो
दुर्गुण सारे विघटित हों
हे प्रणेता ! ऐसा वर दो...

कर्म मेरे - परिणाम मेरा
क्या इससे तुम संबद्ध नहीं
जन्म तेरे - विराम तेरा
क्या इससे मैं आबद्ध नहीं

हे दिग्दर्शक ! ऐसा निर्णय दो
स्वच्छ धवल जीवन निर्मल हो
हे प्रणेता ! ऐसा वर दो...

निर्णय जब लूं तब दृढ़ता हो
परिणाम सुनूं तब धैर्य रहे
मन पर मस्तिष्क का शासन हो
कर्मों में सदा ही शौर्य रहे

हे पालक ! ऐसा जीवन दो
प्रत्येक दशा में संयम हो
हे प्रणेता ! ऐसा वर दो...
(10.08.97)

मैं और मय

मैंने पहले मय को ढूँढा था
जीवन में मय को गूंदा था
मय ही जीवन में रौनक था
मय कजरा झुमका बूंदा था

मैं पर मय पर मैं छाया था
सब भूल था भरमाया था
थी नई अदा इठलाया था
धुन में अपनी इतराया था

मैंने मय को परिभाषा दी
फिर मय ने मैं को भाषा दी
मैं ने फिर मय अभिलाषा की
छाई मैं पर मय त्राषा सी

मैं ने मय को अवतार दिया
फिर मैं ने मय स्वीकार किया
मय ने मैं पर अधिकार किया
फिर मय ने मैं को मार दिया ||
(22.07.94)

उपेक्षित

बरात जा रही है
रौशनी, स्वयं को परिवर्तित कर रही है
संगीत की तीव्र धुनें
पैरों को
थिरकने पर विवश कर रही हैं |

एक विशाल जनसमूह
वृद्ध-युवा-बच्चे-महिलाएं
या यूं कहें
सम्बन्धी-मित्र-पड़ोसी-शुभचिंतक
सभी कतारों को बनाते बिगड़ते
मध्यम गति से
चलते जाते हैं |

प्रथम पंक्ति में
युवा एवं बच्चे नाच रहे हैं
कुछ वृद्ध भी हैं - अधेड़ भी
एक लय है
एक उन्माद है |

मगर

कोई है
जो नाच तो रहा है
या शायद
नाचने का अथक प्रयास कर  रहा है  |

भाव विहीन चेहरा है
कोई कुंठा है
या मानसिक अंतरद्वंद
औरों के साथ
स्वयं को लाने की प्रतिस्पर्धा
औरों के साथ स्वयं को
रखने का प्रयास |

ऐसा क्यूँ होता है ?
कोई वजह तो है
अभाव है
जो उसे पीड़ित कर रहा है
जो असमान्य कर रहा है
सामान्य से ज़रा सी बदली दशाओं में |

मैंने महसूस किया है
वो उपेक्षित  रहा है
प्रारंभ से ही
हर उस विषय पर
जो उसका अधिकार रहा था
मनुष्य होने के नाते |
(25.06.99)

अजनबी शहर

कोई जाना पहचाना ढूंढती आँखें 
कोई परिचित आवाज सुनने का प्रयास 
सब व्यर्थ

एक अपार भीड़ में
कुछ मिलता जुलता सा 
बिलकुल उसके जैसा 
हाँ - वही तो 
मगर 
मगर नहीं
वो नहीं 

एक दिवास्वप्न 
निरर्थक 

कुछ  है तो बस 
लंबी सडकें 
अंतहीन सडकें 
एक  शिथिल  पथिक 
और अजनबी शहर |
(10.10.99)